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प्रउत (प्रगतिशील उपयोग तत्व)
PROUT (Progressive Utilisation Theory)

नव्यमानवतावाद पर आधारित सामाजिक आर्थिक दर्शन प्रउत पढ़ें और जानें तथा आत्मसात करें, जिससे मानव समाज का कल्याण हो सकेl

प्रउत क्या है?
श्री पी.आर. सरकार द्धारा प्रतिपादित प्रउत एक सामाजिक- आर्थिक दर्शन (Socio-economic theory) है, जिसके अनुसार इस संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड की भौतिक संपदा का मालिक कोई एक व्यक्ति नहीं, कोई व्यक्ति समूह भी नहीं बल्कि स्वयं परमपिता परमात्मा हैl हम सभी इस संपदा का सिर्फ उपयोग करते हैं, इसलिए इसके उपभोग पर समस्त जीव जगत- मानव सहित पेड़-पौधे, पशु-पक्षी जीव-जंतु सभी का अधिकार हैl प्रउत आवश्यकतानुसार इन सबके कल्याण की व्यवस्था करता हैl

प्रउत जरूरी है–
1. पूंजीवाद का एक मात्र विकल्पl
2. सत्ता नहीं, व्यवस्था परिवर्तन के लिएl
3. चंद लोगों ( पूंजीपतियों) के आर्थिक शोषण से समाज को मुक्ति दिलाने के लिएl
4. राजनैतिक स्थिरता एवं आर्थिक आजादी का एकमात्र विकल्पl
5. सामाजिक एवं आर्थिक विषमता को दूर करने के लिएl
6. बेरोजगारी की समस्या को दूर कर, सभी के लिए स्थानीय स्तर पर ही 100% गारंटी के साथ रोजगार की उपलब्धता के लिए
7.बढ़ती महंगाई की मार को रोकने व लोगों के क्रय शक्ति को बढ़ाने के लिएl
8. आर्थिक रूप से विपन्न हो रहे हर घर की संपन्नता व खुशहाली के लिएl
9. विश्व में समृद्धि एवं शांति के लिएl
10. जीव जगत के सर्वांगीण विकास एवं कल्याण के लिएl
11. पर्यावरण (Ecosystem) को बचाने के लिएl

प्रउत के 5 मूलभूत सिद्धांत–

1.*समाजादेशेन बिना धनसंचयः अकर्तव्यःl*
प्रकृति द्वारा प्रदत भौतिक संपदा के उपभोग पर सबका अधिकार हैl लेकिन भौतिक संपदा कि अपनी सीमा है इसलिए किसी भी व्यक्ति को समाज के आदेश के बिना एक सीमा से अधिक धन संचय करने का अधिकार नहीं हैl

2. *स्थूलसूक्ष्मकारणेषु चरमोपयोगः प्रकर्तव्य: विचारसमर्थितं वणटनचl*
स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत में जो कुछ सम्पद निहित है, जीवों के कल्याण के लिए उनका उत्कर्ष साधन (उपयोग) करना है।

3. *व्यष्टिसमष्टिशारोरमानसाध्यत्मिक संभावनायाम् चरमोपयोगश्चl*
व्यष्टि (Individual) एवम समष्टि (Collective) का शारीरिक, मानसिक एवम आध्यात्मिक संभावना का अधिकतम उपयोग।

4.*स्थूलसूक्ष्मकारणोपयोगा: सुसंतुलिताः विधेया:l*
व्यष्टि और समष्टि के कल्याण के लिए इस तरह काम करना होगा जिससे शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक और स्थूल, सूक्ष्म और कारण, इनके उपयोग के बीच सुसंतुलन रहे

5. *देशकालपात्रैः उपयोगाः परिवर्तन्ते ते उपयोगाः प्रगतिशीलाः भवेयुः।*
देश, काल, पात्र के अनुसार उपयोग करने का ढंग बदलता रहेगा और यह प्रगतिशील रहेगा।

श्री पी.आर सरकार ने एक नैतिक एवं विप्लवी समाज (सद्विप्र) की परिकल्पना दी है, जिसका उद्देश्य है:

केवल नैतिकवानों का शासन

आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था

सभी के लिए रोज़गार

वास्तविक नैतिक,सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों की स्थापना, अर्थात जाति, संप्रदाय, लिंग, भाषा आदि पर कोई भेदभाव न हो।

व्यक्तियों और सामाजिक समूहों के बीच समानता पर आधारित सहयोग।

एक ऐसी स्वायत्त व्यवस्था की स्थापना जो उक्त विप्लवी नैतिक समाज में उभरने वाले किसी भी तरह के सामाजिक संकट से निपट सके।

21वीं सदी में जब कि हम विज्ञान और टेक्नोलॉजी में बहुत आगे निकल गए हैं ऐसे समय में आज भी अधिकांश लोग भीषण अर्थ नैतिक शोषण एवं राजनैतिक दिशाहीनता के कारण अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए दिन रात एड़िया रगड़ रहे हैं और अंत में तड़प तड़प के मरने के लिए मजबूर हो रहे हैं, तो प्रश्न यह उठता है कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी जो आज बहुत आगे हैं किस का कल्याण कर रहे हैं? क्या यह कहना सच नहीं है कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल चंद लोग अपने भौतिक स्वार्थ के लिए और अधिकांश लोगों के आर्थिक मानसआर्थिक शोषण के लिए कर रहे हैं?
पूंजीपतियों के अतिशय लाभ की मनोवृति ने वनस्पतियों सहित समस्त जीव जगत को ध्वंस के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया हैl
प्राकृतिक संपदाओं का अनियंत्रित दोहन– जंगलों की बेतहाशा कटाई नदियों में फैक्ट्रियों से निकले रसायन एवं कचरे के जमाव के कारण स्वच्छ जल का अभाव, वायुमंडल में उत्सर्जित होने वाली विषाक्त गैस और इन सब के परिणाम स्वरूप यूरोप सहित विश्व के अधिकांश भाग में अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़, मौसम का व्यतिक्रम इत्यादि इसके कुछ प्रत्यक्ष उदाहरण हैl
इस तथाकथित प्रजातंत्र में एक षड्यंत्र के तहत राजनैतिक शक्ति को तो विकेंद्रित किया गया, परंतु आर्थिक शक्ति को चंद लोगों के बीच केंद्रीकृत कर समाज में आर्थिक असंतुलन पैदा किया गयाl यह चंद लोग (पूंजीपति) राजनैतिक शक्ति को अपना गुलाम बना कर अहोरात्र अपने शोषकवादी प्रवृत्ति के विस्तार में लगे हुए हैं, जिसके परिणाम स्वरूप आज जनमानस के मन में असंतुष्टि एवं हाहाकार स्पष्ट दिखाई पड़ता हैl
इसका मूल कारण है, कि मनुष्य आज भी मनुष्य के प्रयोजनानुसार उपयुक्त सामाजिक आर्थिक व्यवस्था नहीं कर पाएl भविष्य और भी अंधकारमय न हो, इसलिए आवश्यकता है नव्यमानवतावाद पर आधारित सुसंतुलित, सामाजिक- आर्थिक और राजनैतिक संरचना तैयार करना एवं इस निहितार्थ जनचेतना को जागृत करनाl

आज मनुष्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही हैl अगर अब भी हम नहीं जागे तो अडानी,माल्या,नीरव, चोकसी जैसे लोग बैंको में जमा हमारे पैसे को इन राजनैतिक दलालों के साथ सांठ-गांठ कर डकार जायेंगे, ऐश करेंगे व हमारे ही सर पर अपनी अमीरी का डंका बजाएंगे और हम बेचारे निरीह मन मसोस कर बढ़ी महंगाई व टैक्स दर से इनके इस खुली लूट की भरपाई ही करते रहेंगे।